इस क़दर नम है मिरी चश्मे-पशेमाँ जानाँ !
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मैंने चाहा कि न रोऊँ, ये ग़मे-हिज्र मगर ;
अपनी फ़ितरत में है पर्दे से गुरेज़ाँ जानाँ !
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काश होता तिरी मर्ज़ी के मुताबिक़ लेकिन ;
इक बड़ी चीज़ है मजबूरी-ए-इन्साँ जानाँ !
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क्या ही करता कि उसी पर तो बना था मैं भी ;
चाक चलता है जो बा-गर्दिश-ए-दौराँ जानाँ !
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था तिरा साथ तो चलते थे मबाहिस घंटों ;
अब तो ढूँढे नहीं मिलता कोई उनवाँ जानाँ !
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याद आता है तिरे साथ तो मैं होश में था ;
फिर तिरे बाद रहा कुफ़्र न ईमाँ जानाँ !
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तब से बैठा हूँ तिरा नाम पकड़कर वरना ;
ख़ाक उड़ा दे ये मिरी सहरा-ए-वीराँ जानाँ !
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मैंने आवारगी-ए-इश्क़ में गुल तोड़ा था ;
अब मिरे हाल पे हँसता है गुलिस्ताँ जानाँ !
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ग़ौर करता हूँ तो ऐसा भी मैं मफ़लूज न था ;
इक बहाना थी फ़क़त तंगी-ए-दामाँ जानाँ !
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हम नहीं उनमें जो मिलने पे बहुत दूर से ही ;
एक दूजे को पुकारेंगे कि जानाँ जानाँ !
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