निभा कर चले


हम रुसूमाते-ता’ल्लुक़, निभा कर चले ||
नाज़ कितनों के सर पर उठा कर चले !!

बात करो हो


मनसूब कहीं फ़िरक़ा कहीं ज़ात करो हो !!
क्या ख़ूब बयाँ , ख़ूबी-ए-आयात करो हो !!

उनका चर्चा करा करे कोई



हक़ ज़बाँ का अदा करे कोई !!
वह कहें और मना करे कोई !!
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हों सभी जब गुनाह में शामिल ;
किससे किसका गिला करे कोई !!
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ज़िन्दगी की दुआएं देता हो ;
ऐसे दुश्मन का क्या करे कोई !!
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रूह बदन में अगर नहीं आती


रूह तन में अगर नहीं आती ||
तो मुसीबत भी सर नहीं आती ||

फिर कोई इक़बाल हो


नफ़्स को ना हों गवारा जब कभी भी बंदिशें ;
है ज़रूरी फिर तक़ददुस मज़हबी पामाल हो !!
हो रहेगी ज़िन्दगी , क़ैदे-ख़ुदा से बे - ग़रज़ ;
गर ख़िरद के गिर्द में जमहूरियत का जाल हो !!
फ़लसफ़े को रूह फिर, दरकार है इस दौर में ;
हो ग़ज़ाली फिर से पैदा, फिर कोई इक़बाल हो !!

बाहम यक़ीं नहीं


रिश्ता हमारा यूँ है, कि बाहम यक़ीं नहीं !!
रौशन वले जबीं है, दिले - महजबीं नहीं !!

बुरा बहुत कहा मुझे


जुनूँ में तुमने बारहा , बुरा बहुत कहा मुझे !!
मगर तेरा कहा कभी , लगा नहीं बुरा मुझे !!