निभा कर चले


हम रुसूमाते-ता’ल्लुक़, निभा कर चले ||
नाज़ कितनों के सर पर उठा कर चले !!

रंज से आए न उनके सुकूँ में ख़लल ;
हम तो ज़ख्मों को अपने छिपा कर चले ||

कुछ जो मौजे-हवादिस ने छोड़े हवास ;
उनकी चाहत में वह भी लुटा कर चले ||

उन रफ़ीक़ों से क्यों आज मिलकर चलें ;
हमसे दामन जो अक्सर बचा कर चले ||

थी शमा दिल में उल्फ़त की बुझने लगी ;
सो वह नज़रों से अपनी जला कर चले ||

है ये दस्तक गुले-नौ की शाहिद कि हम ;
ज़र्द हो कर चमन को नया कर चले ||

ज़िन्दगी है फ़क़त ऐसा रुकना फ़राज़ ;
कोई आए कहीं और बस आ कर चले !! 

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