अभी बज़्म में जाम कम चल रहे हैं !
उनका चर्चा करा करे कोई
हक़ ज़बाँ का अदा करे कोई !!
वह कहें और मना करे कोई !!
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हों सभी जब गुनाह में शामिल ;
किससे किसका गिला करे कोई !!
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ज़िन्दगी की दुआएं देता हो ;
ऐसे दुश्मन का क्या करे कोई !!
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फिर कोई इक़बाल हो
नफ़्स को ना हों गवारा जब कभी भी बंदिशें ;
है ज़रूरी फिर तक़ददुस मज़हबी पामाल हो !!
है ज़रूरी फिर तक़ददुस मज़हबी पामाल हो !!
हो रहेगी ज़िन्दगी , क़ैदे-ख़ुदा से बे - ग़रज़ ;
गर ख़िरद के गिर्द में जमहूरियत का जाल हो !!
गर ख़िरद के गिर्द में जमहूरियत का जाल हो !!
फ़लसफ़े को रूह फिर, दरकार है इस दौर में ;
हो ग़ज़ाली फिर से पैदा, फिर कोई इक़बाल हो !!
हो ग़ज़ाली फिर से पैदा, फिर कोई इक़बाल हो !!
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